श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 249
 
 
श्लोक  1.4.249 
एइ मत अनुभव आमार प्रतीत ।
विचारि’ देखिये यदि, सब विपरीत ॥249॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार श्रीमती राधारानी के प्रति मेरे स्नेह भाव को समझा जा सकता है, किन्तु विश्लेषण करने पर मैं उन्हें विरोधाभासी पाता हूँ।
 
“My affectionate feelings for Srimati Radharani can be understood in this way, but when I reflect on them, I find them to be the opposite.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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