श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 245
 
 
श्लोक  1.4.245 
यद्यपि आमार गन्धे जगत्सुगन्ध ।
मोर चित्त - प्राण हरे राधा - अङ्ग - गन्ध ॥245॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मेरा शरीर सम्पूर्ण सृष्टि को सुगन्धित करता है, किन्तु राधारानी के अंगों की सुगन्ध मेरे मन और हृदय को मोहित कर लेती है।
 
“Although my body provides fragrance to the entire universe, the fragrance of Radharani's body captivates my mind and heart.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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