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श्लोक 1.4.245  |
यद्यपि आमार गन्धे जगत्सुगन्ध ।
मोर चित्त - प्राण हरे राधा - अङ्ग - गन्ध ॥245॥ |
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| अनुवाद |
| यद्यपि मेरा शरीर सम्पूर्ण सृष्टि को सुगन्धित करता है, किन्तु राधारानी के अंगों की सुगन्ध मेरे मन और हृदय को मोहित कर लेती है। |
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| “Although my body provides fragrance to the entire universe, the fragrance of Radharani's body captivates my mind and heart. |
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