श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 244
 
 
श्लोक  1.4.244 
मोर वंशी - गीते आकर्षये त्रिभुवन ।
राधार वचने हरे आमार श्रवण ॥244॥
 
 
अनुवाद
“मेरी दिव्य बांसुरी की ध्वनि तीनों लोकों को आकर्षित करती है, किन्तु मेरे कान श्रीमती राधारानी के मधुर शब्दों से मोहित हो जाते हैं।
 
“The sound of my transcendental flute attracts the three worlds, but my ears are captivated by the sweet words of Srimati Radharani.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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