vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 1: आदि लीला
»
अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण
»
श्लोक 239
श्लोक
1.4.239
आमा हइते आनन्दित हय त्रिभुवन ।
आमाके आनन्द दिबे - ऐछे कोन्जन ॥239॥
अनुवाद
"सारी दुनिया मुझसे सुख पाती है। क्या कोई है जो मुझे सुख दे सके?"
"The whole world derives its joy from me. Is there anyone who can give me joy?"
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd