श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 238
 
 
श्लोक  1.4.238 
कृष्णेर विचार एक आछये अन्तरे ।
पूर्णानन्द - पूर्ण - रस - रूप कहे मोरे ॥238॥
 
 
अनुवाद
एक बार भगवान कृष्ण ने अपने हृदय में विचार किया, "सब लोग कहते हैं कि मैं पूर्ण आनन्द हूँ, सभी रसों से परिपूर्ण हूँ।
 
Once Lord Krishna thought to himself, “Everyone says that I am full of joy and all the pleasures.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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