श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 237
 
 
श्लोक  1.4.237 
अतएव भक्त - गणे करि नमस्कार ।
निःशङ्के कहिये, तार हौक्चमत्कार ॥237॥
 
 
अनुवाद
अतः भक्तों को नमस्कार करके उनकी संतुष्टि के लिए मैं बिना किसी हिचकिचाहट के बोलूंगा।
 
Therefore, after saluting the devotees, I will say this without any hesitation for their satisfaction.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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