श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 236
 
 
श्लोक  1.4.236 
ये लागि कहिते भय, से यदि ना जाने ।
इहा वइ किबा सुख आछे त्रिभुवने ॥236॥
 
 
अनुवाद
उनके भय से मैं बोलना नहीं चाहता, किन्तु यदि वे नहीं समझते, तो तीनों लोकों में इससे अधिक सुख की बात और क्या हो सकती है?
 
I do not want to say this out of fear of them, but if they do not understand then what can be more joyful than this in the three worlds?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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