श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 227-228
 
 
श्लोक  1.4.227-228 
अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द, श्रीनिवास ।
गदाधर, दामोदर, मुरारि, हरिदास ॥227॥
आर ग्रत चैतन्य - कृष्णेर भक्त - गण ।
भक्ति - भावे शिरे धरि सबार चरण ॥228॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य, भगवान नित्यानंद, श्रीवास पंडित, गदाधर पंडित, स्वरूप दामोदर, मुरारी गुप्ता, हरिदास ठाकुर और श्री कृष्ण चैतन्य के अन्य सभी भक्त - भक्ति से झुकते हैं, मैं उनके चरणकमलों को अपने मस्तक पर धारण करता हूँ।
 
I offer my obeisances to Advaita Acharya, Lord Nityananda, Srivasa Pandit, Gadadhar Pandit, Swaroop Damodar, Murari Gupta, Haridas Thakur and all other devotees of Sri Krishna Chaitanya and place their lotus feet on my head.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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