श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 225
 
 
श्लोक  1.4.225 
श्री - कृष्ण - चैतन्य गोसाञि रसेर सदन ।
अशेष - विशेषे कैल रस आस्वादन ॥225॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री कृष्ण चैतन्य रस के धाम हैं। उन्होंने स्वयं अनेक प्रकार से रस की मधुरता का आस्वादन किया है।
 
Lord Krishna is the embodiment of the essence of Chaitanya. He himself has tasted the sweetness of the essence in countless ways.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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