श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 224
 
 
श्लोक  1.4.224 
विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवर - श्रेणी - श्यामल - कोमलैरुपनयन्नङ्गैरनङ्गोत्सवम् ।
स्वच्छन्दं व्रज - सुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः शृङ्गारः सखि मूर्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति ॥224॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्यारे दोस्तों, ज़रा देखो तो सही कि श्रीकृष्ण किस तरह वसन्त ऋतु का आनंद ले रहे हैं! गोपियाँ उनके हर अंग को गले लगा रही हैं, और वे मानो प्रेम के साक्षात रूप हैं। अपनी दिव्य लीलाओं से वे सभी गोपियों और सम्पूर्ण सृष्टि को अनुप्राणित कर रहे हैं। अपनी कोमल, नीले-काले हाथों और पैरों से, जो नीले कमल पुष्पों के समान हैं, उन्होंने कामदेव के लिए एक उत्सव रचा है।"
 
"My friends, just look at how Shri Krishna is enjoying the spring season. The gopis embrace every part of his body, making him appear like the embodiment of love. Through his divine play, he brings happiness to all the gopis and the entire creation. With his soft, dark, blue lotus-like arms and feet, he has created a festival for Kamadeva."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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