श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 215
 
 
श्लोक  1.4.215 
यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा ।
सर्व - गोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्त - वल्लभा ॥215॥
 
 
अनुवाद
"जैसे राधा भगवान कृष्ण को प्रिय हैं, वैसे ही उनका स्नान-स्थान [राधा-कुंड] भी उन्हें प्रिय है। वे ही सभी गोपियों में उनकी सबसे प्रिय हैं।"
 
"Just as Radha is dear to Lord Krishna, so is her bathing place (Radhakunda). She alone is the most beloved of all the gopis to him."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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