श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 212
 
 
श्लोक  1.4.212 
गोपिका जानेन कृष्णेर मनेर वाञ्छित ।
प्रेम - सेवा - परिपाटी, इष्ट - समीहित ॥212॥
 
 
अनुवाद
गोपियाँ कृष्ण की इच्छाओं को जानती हैं और उनके आनंद के लिए पूर्ण प्रेमपूर्ण सेवा करना जानती हैं। वे अपने प्रियतम की संतुष्टि के लिए कुशलतापूर्वक अपनी सेवा करती हैं।
 
The gopis know Krishna's desires and how to perform loving service to please him. They serve him skillfully, seeking the satisfaction of their beloved.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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