श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 207
 
 
श्लोक  1.4.207 
सालोक्य - सार्टि - सारूप्य - सामीप्यैकत्व मप्युत ।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥207॥
 
 
अनुवाद
“मेरे भक्त मेरी सेवा करने के स्थान पर सालोक्य, साृष्टि, सारूप्य, सामीप्य या मेरे साथ एकता को स्वीकार नहीं करते – भले ही मैं ये मुक्ति प्रदान करूं।”
 
My devotees do not accept the liberations of Salokya, Sashti, Sarupya, Samipya or identification with Me in return for their service to Me even when I offer them.”
तात्पर्य
श्रीमद- भागवतम् (3.29.11-13) के ये तीन छंद कपिलदेव के रूप में भगवान कृष्ण ने बोले थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)