श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.4.2 
जय जय श्री - चैतन्य जय नित्यानन्द ।
जयाद्वैत - चन्द्र जय गौर - भक्त - वृन्द ॥2॥
 
 
अनुवाद
भगवान चैतन्य महाप्रभु की जय हो! भगवान नित्यानंद की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! और भगवान चैतन्य के सभी भक्तों की जय हो!
 
Victory to Lord Sri Chaitanya Mahaprabhu! Victory to Sri Nityananda Prabhu! Victory to Sri Advaita Acharya! Victory to all the devotees of Sri Chaitanya Mahaprabhu!
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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