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श्लोक 1.4.199  |
प्रीति - विषयानन्दे तदाश्रयानन्द ।
ताँहा नाहि निज - सुख - वाञ्छार सम्बन्ध ॥199॥ |
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| अनुवाद |
| प्रेम के धाम का सुख उस प्रेम के पात्र के सुख में ही है। यह व्यक्तिगत तृप्ति की इच्छा का संबंध नहीं है। |
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| The happiness of being in love lies in the happiness of the object of that love. It is not about the desire for self-fulfillment. |
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