श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 197
 
 
श्लोक  1.4.197 
आर एक गोपी - प्रेमेर स्वाभाविक चिह्न ।
ये प्रकारे हय प्रेम काम - गन्ध - हीन ॥197॥
 
 
अनुवाद
गोपियों के प्रेम का एक और स्वाभाविक लक्षण है कि उसमें वासना का लेशमात्र भी अभाव है।
 
There is another natural characteristic of the love of the Gopis, which shows that there is not even a trace of lust in it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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