श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 195
 
 
श्लोक  1.4.195 
अतएव सेइ सुख कृष्ण - सुख पोखे ।
एइ हेतु गोपी - प्रेमे नाहि काम - दोषे ॥195॥
 
 
अनुवाद
अतः हम पाते हैं कि गोपियों का आनन्द भगवान कृष्ण के आनन्द को पुष्ट करता है। इसीलिए उनके प्रेम में काम का दोष नहीं है।
 
Thus, we see that the happiness of the gopis nourishes the happiness of Lord Krishna. Therefore, the love of the gopis is free from the vice of lust.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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