|
| |
| |
श्लोक 1.4.194  |
किन्तु कृष्णेर सुख हय गोपी - रूप - गुणे ।
ताँर सुखे सुख - वृद्धि हये गोपी - गणे ॥194॥ |
|
| |
| |
| अनुवाद |
| किन्तु कृष्ण गोपियों के सौन्दर्य और सद्गुणों से प्रसन्न होते हैं। और जब गोपियाँ उनकी प्रसन्नता देखती हैं, तो उनका आनन्द बढ़ जाता है। |
| |
| But Krishna derives pleasure from the beauty and virtues of the gopis. And when the gopis see his joy, their happiness increases. |
| ✨ ai-generated |
| |
|