श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 193
 
 
श्लोक  1.4.193 
एइ - मत परस्पर पड़े हुड़ाहुड़ि ।
परस्पर बाढ़े, केह मुख नाहि मुड़ि ॥193॥
 
 
अनुवाद
इस तरह उनके बीच एक प्रतिस्पर्धा होती है जिसमें कोई भी हार नहीं मानता।
 
Thus a competition starts between them, in which no one accepts his defeat.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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