श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.4.19 
आमाके त’ ये ये भक्त भजे येइ भावे ।
तारे से से भावे भजि , - ए मोर स्वभावे ॥19॥
 
 
अनुवाद
"जो भक्त जिस दिव्य भाव से मेरी आराधना करता है, मैं उसके साथ वैसा ही व्यवहार करता हूँ। यही मेरा स्वाभाविक आचरण है।"
 
"Whatever divine emotion my devotee worships me with, I reciprocate with him in that very spirit. This is my natural nature.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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