श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 184
 
 
श्लोक  1.4.184 
निजाङ्गमपि या गोप्यो ममेति समुपासते ।
ताभ्यः परं न मे पार्थ निगूढ़ - प्रेम - भाजनम् ॥184॥
 
 
अनुवाद
हे अर्जुन, मेरे प्रति गहन प्रेम का पात्र गोपियों से बढ़कर कोई नहीं है, जो अपने शरीर को मेरा मानकर उसे शुद्ध और सुशोभित करती हैं।
 
"O Arjuna, there is no one more deeply loved by me than the gopis. They cleanse and adorn their bodies because they consider them mine."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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