vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 1: आदि लीला
»
अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण
»
श्लोक 184
श्लोक
1.4.184
निजाङ्गमपि या गोप्यो ममेति समुपासते ।
ताभ्यः परं न मे पार्थ निगूढ़ - प्रेम - भाजनम् ॥184॥
अनुवाद
हे अर्जुन, मेरे प्रति गहन प्रेम का पात्र गोपियों से बढ़कर कोई नहीं है, जो अपने शरीर को मेरा मानकर उसे शुद्ध और सुशोभित करती हैं।
"O Arjuna, there is no one more deeply loved by me than the gopis. They cleanse and adorn their bodies because they consider them mine."
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd