श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 183
 
 
श्लोक  1.4.183 
ए - देह - दर्शन - स्पर्शे कृष्ण - सन्तोष ण’ ।
एइ ला गि’ करे देहेर मार्जन - भूषण ॥183॥
 
 
अनुवाद
“कृष्ण को इस शरीर को देखने और स्पर्श करने में आनंद मिलता है।” यही कारण है कि वे अपने शरीर को शुद्ध और सजाते हैं।
 
"Krishna enjoys seeing and touching this body. That is why she cleans and adorns her body."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)