श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.4.18 
आमारे ईश्वर माने, आपनाके हीन ।
तार प्रेमे वश आमि ना हइ अधीन ॥18॥
 
 
अनुवाद
“यदि कोई मुझे परमेश्वर मानता है और स्वयं को अधीनस्थ मानता है, तो मैं उसके प्रेम के अधीन नहीं होता, न ही वह मुझे नियंत्रित कर सकता है।
 
If anyone thinks of Me as God and submits themselves to Me, then I am neither subject to their love, nor can their love subdue Me.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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