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श्लोक 1.4.173  |
यत्ते सुजात - चरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित् कूर्पादिभिर्भमति धीर्भवदायुषां नः ॥173॥ |
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| अनुवाद |
| "हे प्रियतम! आपके चरणकमल इतने कोमल हैं कि हम उन्हें अपने वक्षस्थलों पर धीरे से रखते हैं, इस भय से कि कहीं आपके चरणों में चोट न लग जाए। हमारा जीवन केवल आपमें ही निहित है। इसलिए हमारे मन में यह चिंता रहती है कि कहीं वन-पथ पर विचरण करते समय आपके कोमल चरणों में कंकड़-पत्थर न लग जाएँ।" |
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| "O beloved! Your lotus feet are so delicate that we gently place them on our breasts, fearing they might hurt us. Our lives depend solely on you. Therefore, our hearts are filled with the fear that your delicate feet might be bruised by the pebbles as we walk through the forest." |
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