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श्लोक 1.4.166  |
कामेर तात्पर्य - निज - सम्भोग केवल ।
कृष्ण - सुख - तात्पर्य - मात्र प्रेम त’ प्रबल ॥166॥ |
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| अनुवाद |
| काम का विषय तो केवल अपनी इन्द्रियों का भोग है। किन्तु प्रेम भगवान कृष्ण के भोग का साधन है, अतः यह अत्यंत शक्तिशाली है। |
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| The goal of lust is merely to satisfy one's own senses. But love is focused on the pleasure (enjoyment) of Lord Krishna and is therefore extremely powerful. |
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