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श्लोक 1.4.162  |
गोपी - गणेर प्रेमेर ‘रूढ़ - भाव’ नाम ।
विशुद्ध निर्मल प्रेम, कभु नहे काम ॥162॥ |
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| अनुवाद |
| गोपियों का प्रेम रूढ़ भाव कहलाता है। यह शुद्ध और निष्कलंक होता है। इसमें कभी वासना नहीं होती। |
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| The love of the gopis is called "roodha bhaav." It is pure and untainted. It is never sexual. |
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