श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 156
 
 
श्लोक  1.4.156 
गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं लावण्य - सारमसमोर्ध्वमनन्य - सिद्धम् ।
दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुरापम् एकान्त - धाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य ॥156॥
 
 
अनुवाद
[मथुरा की स्त्रियों ने कहा:] "गोपियों ने कौन-सी तपस्या की होगी? वे अपनी आँखों से सदैव भगवान कृष्ण के रूप का अमृत पीती रहती हैं, जो कि सौंदर्य का सार है और जिसकी बराबरी या उससे बढ़कर कुछ नहीं किया जा सकता। वह सौंदर्य ही सौन्दर्य, यश और ऐश्वर्य का एकमात्र निवास है। वह स्वयंसिद्ध, नित्य नवीन और अत्यंत दुर्लभ है।"
 
[The women of Mathura said:] "Who knows what penance the gopis have performed? With their eyes they constantly drink the nectar of Lord Krishna's form, which is the essence of beauty and nothing can be equaled or surpassed. This beauty is the only source of beauty, fame, and prosperity. It is complete in itself, ever new, and extremely rare."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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