श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  1.4.143 
आमार माधुर्य नित्य नव नव हय ।
स्व - स्व - प्रेम - अनुरूप भक्ते आस्वादय ॥143॥
 
 
अनुवाद
"मेरी मिठास हमेशा नई और नई होती है। भक्तजन अपने-अपने प्रेम के अनुसार उसका स्वाद लेते हैं।"
 
My sweetness is renewed every day. Devotees savor it according to their love.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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