श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 142
 
 
श्लोक  1.4.142 
मन्माधुर्य राधार प्रेम दोंहे होड़ करि’ ।
क्षणे क्षणे बाड़े दोंह, केह नाहि हारि ॥142॥
 
 
अनुवाद
"मेरे माधुर्य और राधा के प्रेम के दर्पण के बीच निरंतर प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। दोनों बढ़ते रहते हैं, पर हार किसी में नहीं होती।
 
"There is a constant competition between my sweetness and Radha's mirror of love. They both grow, but neither knows how to lose."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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