श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 139
 
 
श्लोक  1.4.139 
एइ प्रेम - द्वारे नित्य राधिका एकलि ।
आमार माधुर्यामृत आस्वादे सकलि ॥139॥
 
 
अनुवाद
“केवल राधिका ही अपने प्रेम के बल से मेरे माधुर्य के समस्त रस का आस्वादन करती हैं।
 
“Only Radhika, with the power of her love, tastes the entire nectar of my sweetness.”
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd