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श्लोक 1.4.139  |
एइ प्रेम - द्वारे नित्य राधिका एकलि ।
आमार माधुर्यामृत आस्वादे सकलि ॥139॥ |
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| अनुवाद |
| “केवल राधिका ही अपने प्रेम के बल से मेरे माधुर्य के समस्त रस का आस्वादन करती हैं। |
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| “Only Radhika, with the power of her love, tastes the entire nectar of my sweetness.” |
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