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श्लोक 1.4.136  |
एत चि न्ति’ रहे कृष्ण परम - कौतुकी ।
हृदये बाड़ये प्रेम - लोभ धक्धकि ॥136॥ |
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| अनुवाद |
| ऐसा सोचकर भगवान कृष्ण उस प्रेम का आस्वादन करने के लिए उत्सुक हो उठे। उनके हृदय में उस प्रेम की उत्कट अभिलाषा और भी तीव्र हो उठी। |
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| Thinking this way, Lord Krishna was eager to taste that love. A burning desire to taste it burned like fire in his heart. |
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