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श्लोक 1.4.135  |
कभु यदि एइ प्रेमार हइये आश्रय ।
तबे एइ प्रेमानन्देर अनुभव हय ॥135॥ |
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| अनुवाद |
| "यदि कभी मैं उस प्रेम का निवास बन सकूँ, तभी मैं उसके आनन्द का स्वाद ले सकूँगा।" |
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| “If I ever become the shelter of that love, only then can I taste that joy.” |
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