श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  1.4.135 
कभु यदि एइ प्रेमार हइये आश्रय ।
तबे एइ प्रेमानन्देर अनुभव हय ॥135॥
 
 
अनुवाद
"यदि कभी मैं उस प्रेम का निवास बन सकूँ, तभी मैं उसके आनन्द का स्वाद ले सकूँगा।"
 
“If I ever become the shelter of that love, only then can I taste that joy.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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