|
| |
| |
श्लोक 1.4.128  |
राधा - प्रेमा विभु - यार बाड़िते नाहि ठा ञि ।
तथापि से क्षणे क्षणे बाड़ये सदाइ ॥128॥ |
|
| |
| |
| अनुवाद |
| "राधा का प्रेम सर्वव्यापी है, जिसमें विस्तार की कोई गुंजाइश नहीं है। फिर भी यह निरंतर विस्तृत हो रहा है।" |
| |
| Radha's love is all-encompassing, limitless in its scope. Yet it continues to grow. |
| ✨ ai-generated |
| |
|