श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  1.4.128 
राधा - प्रेमा विभु - यार बाड़िते नाहि ठा ञि ।
तथापि से क्षणे क्षणे बाड़ये सदाइ ॥128॥
 
 
अनुवाद
"राधा का प्रेम सर्वव्यापी है, जिसमें विस्तार की कोई गुंजाइश नहीं है। फिर भी यह निरंतर विस्तृत हो रहा है।"
 
Radha's love is all-encompassing, limitless in its scope. Yet it continues to grow.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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