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श्लोक 1.4.126  |
निज - प्रेमास्वादे मोर हय ये आह्लाद ।
ताहा ह’ते कोटि - गुण राधा - प्रेमास्वाद ॥126॥ |
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| अनुवाद |
| “श्रीमती राधारानी के प्रति मेरे प्रेम का आस्वादन करने से मुझे जो भी आनंद मिलता है, वह अपने प्रेम से मुझसे करोड़ गुना अधिक आनंद प्राप्त करती हैं। |
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| Whatever joy I derive from the taste of my love for Srimati Radharani, she experiences love a million times more than I do. |
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