श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  1.4.125 
कस्माद्वन्दे प्रिय - सखि हरेः पाद - मूलात्कुतोऽसौ कुण्डारण्ये किमिह कुरुते नृत्य - शिक्षा गुरुः कः ।
तं त्वन्मूर्तिः प्रति - तरु - लतं दिग्विदिक्षु स्फुरन्ती शैलूषीव भ्रमति परितो नर्तयन्ती स्व - पश्चात् ॥125॥
 
 
अनुवाद
“हे मेरी प्रिय सखी वृंदा, तुम कहाँ से आ रही हो?”
 
“O dear friend Vrinda, where are you coming from?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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