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श्लोक 1.4.125  |
कस्माद्वन्दे प्रिय - सखि हरेः पाद - मूलात्कुतोऽसौ कुण्डारण्ये किमिह कुरुते नृत्य - शिक्षा गुरुः कः ।
तं त्वन्मूर्तिः प्रति - तरु - लतं दिग्विदिक्षु स्फुरन्ती शैलूषीव भ्रमति परितो नर्तयन्ती स्व - पश्चात् ॥125॥ |
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| अनुवाद |
| “हे मेरी प्रिय सखी वृंदा, तुम कहाँ से आ रही हो?” |
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| “O dear friend Vrinda, where are you coming from?” |
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