श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के बाह्य कारण  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.3.9 
‘वैवस्व त’ - नाम एइ सप्तम मन्वन्तर ।
साताइश चतुर्युग ताहार अन्तर ॥9॥
 
 
अनुवाद
वर्तमान मनु, जो सातवें हैं, वैवस्वत [विवस्वान के पुत्र] कहलाते हैं। उनकी आयु के सत्ताईस दिव्ययुग [27 × 4,320,000 सौर वर्ष] बीत चुके हैं।
 
The present Manu is the seventh and is called Vaivasvata (son of Vivasvan). Twenty-seven divine ages (27 * 43,20,000 solar years) of his life have passed.
तात्पर्य
चौदह मनूओं के नाम इस प्रकार हैं: (1) स्वायम्भुव, (2) स्वरोचिष, (3) उत्तम, (4) तामस, (5) रैवत, (6) चाक्षुष, (7) वैवस्वत, (8) सावर्णि, (9) दक्ष-सावर्णि, (10) ब्रह्म-सावर्णि, (11) धर्म-सावर्णि, (12) रुद्रपुत्र (रुद्र-सावर्णि), (13) रौच्य, या देव-सावर्णि, (14) और भौत्यक, या इन्द्र-सावर्णि।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)