श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के बाह्य कारण  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  1.3.63 
स्मितालोकः शोकं हरति जगतां यस्य परितो गिरां तु प्रारम्भः कुशल - पटली पल्लवयति ।
पदालम्भः कं वा प्रणयति न हि प्रेम - निवहं स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु ॥63॥
 
 
अनुवाद
"भगवान श्री चैतन्य के रूप में भगवान हम पर अपनी अहैतुकी कृपा करें। उनकी मुस्कुराती हुई दृष्टि संसार के समस्त शोकों को तुरन्त दूर कर देती है, और उनके शब्द ही भक्ति की शुभ लताओं को अपने पत्ते फैलाकर सजीव कर देते हैं। उनके चरणकमलों की शरण लेने से ईश्वर के प्रति दिव्य प्रेम तुरन्त जागृत हो जाता है।"
 
"May the Supreme Personality of Godhead in the form of Sri Chaitanya shower His causeless mercy upon us. His smiling glance instantly dispels all worldly sorrows, and His words nourish and give life to the vines of auspicious devotion. Taking refuge in His lotus feet instantly awakens transcendental love for the Lord."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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