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श्लोक 1.3.41  |
तप्त - हेम - सम - कान्ति, प्रकाण्ड शरीर ।
नव - मेघ जिनि कण्ठ - ध्वनि ये गम्भीर ॥41॥ |
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| अनुवाद |
| उनके विशाल शरीर की चमक पिघले हुए सोने के समान है। उनकी वाणी की गम्भीर ध्वनि नए-नए एकत्रित बादलों की गड़गड़ाहट को भी परास्त कर देती है। |
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| The radiance of his broad body is like molten gold. His deep voice can overcome the roar of the newly formed clouds. |
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