श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के बाह्य कारण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.3.33 
डुभृधातुर अर्थ - पोषण, धारण ।
पुषिल, धरिल प्रेम दिया त्रिभुवन ॥33॥
 
 
अनुवाद
"दुभृण्" [जो "विश्वम्भर" शब्द का मूल है] पोषण और पालन का संकेत देता है। वे [भगवान चैतन्य] ईश्वरीय प्रेम का वितरण करके तीनों लोकों का पोषण और पालन करते हैं।
 
The verb "dubhṛṇ" (which is the root of the word Vishvambhara) signifies nourishment and sustenance. He (Chaitanya Mahaprabhu) nourishes the three worlds by distributing love for the Lord.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)