श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के बाह्य कारण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.3.31 
सेइ सिंह वसुक्जीवेर हृदय - कन्दरे ।
कल्मष - द्विरद नाशे याँहार हुङ्कारे ॥31॥
 
 
अनुवाद
वह सिंह प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजमान हो। इस प्रकार अपनी गूँजती हुई गर्जना से वह मनुष्य के हाथी जैसे दुर्गुणों को दूर भगाए।
 
May that lion reside within the heart of every living being, thus removing the elephant-like sins of man with his roar.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)