vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 1: आदि लीला
»
अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के बाह्य कारण
»
श्लोक 31
श्लोक
1.3.31
सेइ सिंह वसुक्जीवेर हृदय - कन्दरे ।
कल्मष - द्विरद नाशे याँहार हुङ्कारे ॥31॥
अनुवाद
वह सिंह प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजमान हो। इस प्रकार अपनी गूँजती हुई गर्जना से वह मनुष्य के हाथी जैसे दुर्गुणों को दूर भगाए।
May that lion reside within the heart of every living being, thus removing the elephant-like sins of man with his roar.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×