श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के बाह्य कारण  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.3.23 
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्म - संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥23॥
 
 
अनुवाद
'धर्मात्माओं का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म के सिद्धांतों की पुनः स्थापना करने के लिए मैं स्वयं युग-युग में प्रकट होता हूँ।'
 
“I appear in every age to save the holy souls and destroy the wicked, as well as to restore righteousness.
तात्पर्य
पाठ्य २२ और २३ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भगवद्गीता (४.७-८) में कही गयी थी | इसके बाद आने वाले पाठ्य २४ और २५ भी भगवद्गीता (३.२४, २१) में पाये जाते है |
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)