श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के बाह्य कारण  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.3.16 
ऐश्वर्य - ज्ञानेते सब जगत्मिश्रित ।
ऐश्वर्य - शिथिल - प्रेमे नाहि मोर प्रीत ॥16॥
 
 
अनुवाद
"मेरे ऐश्वर्य को जानकर सारा जगत मुझे भय और श्रद्धा से देखता है। किन्तु ऐसी श्रद्धा से क्षीण हुई भक्ति मुझे आकर्षित नहीं करती।
 
"Knowing of my opulence, the whole world looks at me with fear and respect. But devotion weakened by such respect does not attract me."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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