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श्लोक 1.3.16  |
ऐश्वर्य - ज्ञानेते सब जगत्मिश्रित ।
ऐश्वर्य - शिथिल - प्रेमे नाहि मोर प्रीत ॥16॥ |
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| अनुवाद |
| "मेरे ऐश्वर्य को जानकर सारा जगत मुझे भय और श्रद्धा से देखता है। किन्तु ऐसी श्रद्धा से क्षीण हुई भक्ति मुझे आकर्षित नहीं करती। |
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| "Knowing of my opulence, the whole world looks at me with fear and respect. But devotion weakened by such respect does not attract me." |
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