श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के बाह्य कारण  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.3.14 
चिर - काल नाहि करि प्रेम - भक्ति दान ।
भक्ति विना जगतेर नाहि अवस्थान ॥14॥
 
 
अनुवाद
"बहुत समय से मैंने संसार के निवासियों पर अपनी अनन्य प्रेममयी सेवा नहीं की है। ऐसे प्रेममयी लगाव के बिना, भौतिक जगत का अस्तित्व ही व्यर्थ है।
 
"For a long time I have not bestowed upon the inhabitants of the universe my unconditional love and devotion. Without such loving devotion, the existence of the material world is meaningless.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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