श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के बाह्य कारण  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  1.3.104 
तुलसी - दल - मात्रेण जलस्य चुलुकेन वा ।
विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्त - वत्सलः ॥104॥
 
 
अनुवाद
"श्रीकृष्ण, जो अपने भक्तों के प्रति अत्यंत स्नेही हैं, स्वयं को उस भक्त को बेच देते हैं जो उन्हें केवल एक तुलसी पत्र और एक मुट्ठी जल अर्पित करता है।"
 
“Krishna, who is extremely affectionate towards his devotees, sells himself to that devotee who offers him only a Tulsi leaf and a handful of water.”
तात्पर्य
यह गौतमीय-तंत्र का एक श्लोक है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)