परम सत्य की प्राथमिक क्षमताओं को तीन बताया गया है: आंतरिक, बाहरी और सीमांत। अपनी आंतरिक क्षमता के कृत्यों के द्वारा, भगवान अपनी मूल आकृति में व्यक्तित्व वैकुण्ठलोक के रूप में जानी जाने वाली आध्यात्मिक ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्तियों को प्रदर्शित करते हैं, जो भौतिक ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्ति के विनाश के बाद भी अनंत काल तक विद्यमान रहते हैं। अपनी सीमांत क्षमता से, भगवान स्वयं को जीवन के जीवों के रूप में विस्तारित करते हैं जो उनका हिस्सा हैं, जैसे सूर्य अपनी किरणों को सभी दिशाओं में वितरित करता है। अपनी बाहरी क्षमता से, भगवान भौतिक सृजन को प्रकट करते हैं, जैसे कि अपनी किरणों से सूर्य कोहरा बनाता है। भौतिक सृजन अनन्त वैकुण्ठ प्रकृति का एक विकृत प्रतिबिंब है।
परम सत्य की इन तीनों ऊर्जाओं का वर्णन विष्णु पुराण में भी मिलता है, जहाँ यह कहा गया है कि जीवित प्राणी आंतरिक क्षमता की गुणवत्ता के बराबर है, जबकि बाहरी क्षमता सभी कारणों के मुख्य कारण द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित होती है। माया, भ्रामक ऊर्जा, एक जीवित प्राणी को गुमराह करती है क्योंकि कोहरा पैदल चलने वाले को सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध करके गुमराह करता है। यद्यपि माया की क्षमता जीवन के जीवों की तुलना में गुणवत्ता में निम्न है, जो कि भगवान का हिस्सा और पार्सल हैं, फिर भी इसमें जीवित प्राणियों को नियंत्रित करने की शक्ति है, जैसे कि कोहरा सूर्य की किरणों के एक निश्चित हिस्से के कार्यों को अवरुद्ध कर सकता है, हालांकि यह सूर्य को कवर नहीं कर सकता। भ्रामक ऊर्जा से ढके जीवित प्राणी जीवन की विभिन्न प्रजातियों में विकसित होते हैं, शरीर एक तुच्छ चींटी से लेकर ब्रह्मा तक होता है, जो ब्रह्माण्ड का निर्माता है। प्रधान, अवैयक्तिक दृष्टि में सभी कारणों का मुख्य कारण, परम प्रभु के अलावा और कोई नहीं है, जिसे कोई आंतरिक क्षमता में आमने-सामने देख सकता है। वह अपनी अकल्पनीय शक्ति से भौतिक सर्वव्यापी रूप लेता है। यद्यपि सभी तीन शक्तियाँ - अर्थात् आंतरिक, बाहरी और सीमांत - मौलिक रूप से अंतिम मुद्दे में एक हैं, वे क्रिया में अलग-अलग हैं, जैसे विद्युत ऊर्जा, जो विभिन्न परिस्थितियों में ठंड और गर्मी दोनों उत्पन्न कर सकती है। बाहरी और सीमांत शक्तियों को विभिन्न परिस्थितियों में कहा जाता है, लेकिन मूल, आंतरिक शक्तियों में ऐसी कोई स्थिति नहीं होती है, न ही बाहरी क्षमता की शर्तों का सीमांत में मौजूद होना संभव है, या इसके विपरीत। जो परम प्रभु की इन सभी ऊर्जाओं की पेचीदगियों को समझने में सक्षम है वह अब ज्ञान के एक गरीब कोष के प्रभाव में एक अनुभववादी अवैयक्तिकवादी नहीं रह सकता है।
