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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.2.9 
‘नन्द - सुत’ बलि’ याँरे भागवते गाइ ।
सेइ कृष्ण अवतीर्ण चैतन्य - गोसाञि ॥9॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवत में जिन्हें नन्द महाराज का पुत्र बताया गया है, वे भगवान चैतन्य के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं।
 
The one whom Srimad Bhagavatam describes as the son of Nanda Maharaja, is the same Lord who incarnated on this earth as Lord Chaitanya.
तात्पर्य

साहित्य में कुशल रचना के लिए अलंकारिक व्यवस्था के नियमों के अनुसार, किसी विषय का उल्लेख उसके विधेय से पहले किया जाना चाहिए। वैदिक साहित्य में प्रायः ब्रह्म, परमात्मा और भगवान का उल्लेख होता है, और इसलिए ये तीन शब्द व्यापक रूप से दिव्य समझ के विषय के रूप में जाने जाते हैं। लेकिन यह व्यापक रूप से ज्ञात नहीं है कि जो अवैयक्तिक ब्रह्म के रूप में जाना जाता है वह श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य शरीर का प्रकाश है। न ही यह व्यापक रूप से ज्ञात है कि अध्यात्म, या परमात्मा, भगवान चैतन्य का केवल एक आंशिक प्रतिनिधित्व है, जो स्वयं भगवान के समान हैं। इसलिए ब्रह्म को भगवान चैतन्य के प्रकाश के रूप में, परमात्मा को उनके आंशिक प्रतिनिधित्व के रूप में और भगवान कृष्ण को भगवान चैतन्य महाप्रभु के समान रूप में वर्णन करने की पुष्टि आधिकारिक वैदिक साहित्यों के साक्ष्य द्वारा की जानी चाहिए।

लेखक पहले स्थापित करना चाहता है कि वेदों का सार विष्णु-तत्त्व है, परम सत्य, विष्णु, सर्वव्यापी ईश्वर। विष्णु-तत्त्व की विभिन्न श्रेणियाँ हैं, जिनमें सर्वोच्च भगवान कृष्ण है, परम विष्णु-तत्त्व, जैसा कि भगवद-गीता और पूरे वैदिक साहित्य में पुष्टि की गई है। श्रीमद-भागवतम में भगवान कृष्ण को ही नंद-सुत, राजा नंद के पुत्र के रूप में वर्णित किया गया है। कृष्णाकांत कविराज गोस्वामी कहते हैं कि नंद-सुत फिर से भगवान श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए हैं, और वह इस कथन को अपनी समझ पर आधारित करते हैं कि वैदिक साहित्य यह निष्कर्ष निकालता है कि भगवान कृष्ण और भगवान चैतन्य महाप्रभु में कोई अंतर नहीं है। यह लेखक साबित करेगा। यदि यह इस प्रकार सिद्ध हो जाता है कि श्री कृष्ण सभी तत्वों (सत्य) अर्थात ब्रह्म, परमात्मा और भगवान की उत्पत्ति हैं, और श्री कृष्ण और भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच कोई अंतर नहीं है, तो यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि श्री चैतन्य महाप्रभु भी सभी तत्वों की एक ही उत्पत्ति हैं। एक ही परम सत्य, जैसा कि वह विभिन्न अनुभूतियों के छात्रों के लिए प्रकट होता है, ब्रह्म, परमात्मा और भगवान कहलाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)