vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 1: आदि लीला
»
अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु
»
श्लोक 86
श्लोक
1.2.86
भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव ।
आर्ष - विज्ञ - वाक्ये नाहि दोष एइ सब ॥86॥
अनुवाद
“प्रामाणिक ऋषियों के कथनों में भूल, भ्रम, छल और दोषपूर्ण धारणा नहीं होती।
The words of authentic sages are free from errors, delusions, tendency to deceive and false perceptions (imperfection of the senses).
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd