| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु » श्लोक 78 |
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| | | | श्लोक 1.2.78  | विप्रत्व विख्यात तार पाण्डित्य अज्ञात ।
अतएव विप्न आगे, पाण्डित्य पश्चात ॥78॥ | | | | | | | अनुवाद | | "व्यक्ति का विप्र होना तो ज्ञात है, परन्तु उसका पाण्डित्य अज्ञात है। इसलिए व्यक्ति की पहचान पहले होती है, पाण्डित्य की बाद में।" | | | | "A person's status as a Brahmin is known, but his scholarship is unknown. Therefore, the person's identity is determined first, and his scholarship comes later. | | ✨ ai-generated | | |
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