Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  1.2.67 
एते चांश - कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम् ।
इन्द्रारि - व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥67॥
 
 
अनुवाद
"भगवान के ये सभी अवतार या तो पुरुष-अवतारों के पूर्ण अंश हैं या उनके पूर्ण अंशों के अंश हैं। किन्तु कृष्ण स्वयं भगवान हैं। प्रत्येक युग में, जब इंद्र के शत्रुओं द्वारा संसार त्रस्त होता है, तब वे अपने विभिन्न रूपों द्वारा जगत की रक्षा करते हैं।"
 
All these incarnations of the Supreme Lord are either parts of the Purusha incarnations or parts of the parts (kālas). But Krishna Himself is the Supreme Personality of Godhead. In every age, whenever Indra's enemies disturb the world, He protects the world through His various forms.
तात्पर्य
श्रीमद भागवतम (1.3.28) का यह कथन उस विचार को स्पष्ट रूप से नकारता है कि श्री कृष्ण विष्णु या नारायण के अवतार हैं। भगवान् श्री कृष्ण ही मूल भगवान हैं, समस्त कारणों के कारण हैं। इस श्लोक से यह स्पष्ट रूप से संकेत मिलता है कि भगवान के अवतार जैसे श्री राम, नृसिंह और वराह सभी निसंदेह विष्णु समूह के हैं, लेकिन वे सभी पूर्ण अंश या मूल भगवान के पूर्ण अंशों के अंश हैं, भगवान श्री कृष्ण हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)