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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  1.2.65 
अद्वय - ज्ञान तत्त्व - वस्तु कृष्णेर स्वरूप ।
ब्रह्म, आत्मा, भगवान् तिन ताँर रूप ॥65॥
 
 
अनुवाद
भगवान कृष्ण स्वयं एक अविभाजित परम सत्य, परम सत्य हैं। वे स्वयं को तीन रूपों में प्रकट करते हैं - ब्रह्म, परमात्मा और भगवान।
 
Lord Krishna Himself is the Supreme, non-dual Truth, the ultimate reality. He manifests Himself in three aspects: Brahman, Paramatma, and Bhagavan.
तात्पर्य
श्रीमद्-भागवतम (1.2.11) से उद्धृत उपरोक्त पद्य में, प्रमुख शब्द, भगवान, भगवान के व्यक्तित्व को इंगित करता है, और ब्रह्म और परमात्मा उनके साथ-साथ जुड़े हुए हैं जो पूर्णतः व्यक्तित्व से लिए गए हैं, जैसे एक सरकार और उसके मंत्री सर्वोच्च कार्यकारी प्रमुख से लिए गए हैं। दूसरे शब्दों में, मुख्य सत्य तीन विभिन्न चरणों में प्रदर्शित होता है। परम सत्य, भगवान श्री कृष्ण (भगवान), को ब्रह्म और परमात्मा के नाम से भी जाना जाता है, हालाँकि ये सभी रूप समान हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)